एक कहानी लड्डू गोपाल की सच्ची सेवा की

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यह लड्डू गोपाल की कहानी और उनकी एक ऐसे भक्त की है जो निःस्वार्थ भाव से अपने प्रभु की सेवा में लीन रहती है अनजाने में ही सही लेकिन वो कुछ ऐसा कर जाती है जो सिर्फ एक सच्चे भक्त ही कर सकता है और फिर श्री कृष्णा के बाल स्वरूप “लड्डू गोपाल” की आपार कृपा उस पर बरसाती है तो चलिए अब इस कहानी का आरम्भ करते है।

एक समय की बात है एक गाँव में दो वृद्ध स्त्रियाँ रहती थीं। दोनों का इस जगत में कोई नहीं था वे दोनों ही एक दूसरे का सहारा बनकर बड़े प्रेम भाव से रहती थी। हालाँकि धर्म से दोनों अलग थी लेकिन विचार से एक थी।

उनमे से एक महिला हिन्दू धर्म की थी और दूसरी जैन धर्म की थी। दोनों अपने अपने धर्म के हिसाब से प्रभु की आराधना किया करती थी।

उनमे से हिन्दू धर्म की महिला थी उसने अपने घर के मन्दिर में श्री कृष्णा के बाल स्वरूप “लड्डू गोपाल” को बड़े प्रेम भाव से विराजमान किया हुआ था, और उन्हें प्रतिदिन एक बालक के भांति प्रातः काल नहला धुलाकर, सुन्दर वस्त्र- आभूषण आदि पहनाकर तैयार करती थी।

वह उन्हें एक बालक के समान ही मानती थी इसी लिए कही भी बाहर जाती उनके लिए फल खिलौने आदि चीजे ले कर आती थी और प्रेम पूर्वक उनको भोग लगती थी।

इसी तरह वे दोनों महिलाये एक दूसरे के परस्पर सहयोग से अपना सुखमय जीवन व्यतीत कर रही थी वो दोनों जब पूजा पाठ एवं सभी कामो से मुक्त होती थी तब बचा हुआ समय एक दूसरे के साथ सुख दुःख बाटते हुए व्यतीत करती थी।

तीर्थयात्रा जाने का अवसर

कुछ समय बीतने के बाद श्रावण मास में हिन्दू महिला को तीर्थ यात्रा पर जाने का अवसर मिला, तब उसने अपनी अतिप्रिय उस जैन धर्म की महिला से भी चलने के लिए कहा चूँकि वृद्धावस्था अधिक होने कारण वह चलने फिरने में थोड़ी असमर्थ थी

इसी लिए उसने जाने से माना कर दिया। और कहा की मुझे चलने फिरने में परेशानी होगी इसी कारण तुम्हे भी तीर्थ यात्रा में विघ्न रहेगा।

तब वो हिन्दू महिला उदास मन से तीर्थ यात्रा पर अकेले ही जाने के लिए तैयार हो गयी। और जाते वक्त उसने उस जैन महिला से कहा- सखी मै एक माह के लिए तीर्थ यात्रा पर जा रही हूँ मेरे आराध्य श्री कृष्णा बाल स्वरूप “लड्डू गोपाल” का ध्यान रखना उन्हें बिलकुल एक बालक की तरह स्नेह देना।

प्रतिदिन स्नान आदि कराकर सुंदर वस्त्र आभूषण पहनाकर भोग लगाना, उस जैन महिला ने सब बाते सुनी और बोली की हाँ सखी तुम चिन्ता मुक्त होकर तीर्थयात्रा को जाओ मै तुम्हारे लड्डू गोपाल का भलीभाँति ध्यान रखूंगी।

इतनी सब बातें बताकर वह महिला तीर्थयात्रा को निकल गयी और जैन महिला ने सारा कार्यभार अपने सानिध्य में लिया। और बड़े उत्साह और उमंग के साथ सुबह उठकर खुद नित्य कर्म से निवृत्त होकर लड्डू गोपाल के स्नान की तैयारी में लग गयी।

उसके बाद जब वो उन्हें (लड्डू गोपाल) को नहलाने लगी तो वह उस महिला की नजर लड्डू गोपाल के पाँव की तरफ पड़ी तो वह दंग रह गयी क्यूंकि उनके पैर मुड़े हुए थे उसे लगा की उसकी वजह से उनके पाँव टेढ़े हो गए है।

इसका मुख्य कारण ये था की उस महिला ने जब भी उन्हें (लड्डू गोपाल) को देखा था वस्त्रों एवं आभूषणों से सुसज्ज्ति देखा था वो इस बात से अनभिज्ञ थी की लड्डू गोपाल घुटनो के बल पर बैठे हुए थे उनका बाल स्वरुप ऐसा ही है।

वह बहुत परेशांन हो गयी। और सोचने लगी की मै अपनी सखी से क्या कहूँगी उसने इतने विश्वास के साथ मुझे ये जिम्मेदारी दी थी, और मैंने लड्डू गोपाल की देखभाल सही से नहीं की। ये सब सोचकर वह चिन्तन में बैठी ही थी।

की उसे याद आया की उसकी सखी ने कहा था की लड्डू गोपाल सिर्फ एक प्रतिमा नहीं बल्कि जीवित होते है बस फिर क्या था उसने निश्चिय किया की दिन प्रतिदिन उनके पैरो की मालिश करेगी और वह दिन में कई बार ऐसा ही करने लगी

और जैसा की श्री कृष्णा का स्वभाव है वो है ही इतने कृपालु दयानिधान, उस वृद महिला की इस नादान भक्ति से वशीभूत होकर उन्होंने उस पर अपनी आपारकृपा लुटा दी। और एक दिन वह महिला रोज की भांति प्रातकाल उठकर लड्डू गोपाल को नहलने का प्रबन्ध कर ही रही थी

की उसकी नजर उनके पैरो पर पड़ी उसे देखा की उनके (लड्डू गोपाल) पैर ठीक हो गए और यह सब देखकर वह वृद महिला खुशी से फूली न समायी और ये सारा वृतान्त सुनने के लिए अपनी सखी का बेसब्री से इंतजार करने लगी

तीर्थयात्रा की वापसी

कुछ समय पश्चात जब वह हिन्दू धर्म की महिला तीर्थयात्रा पूर्ण करके वापस आयी तो सबसे पहले वो अपने लड्डू गोपाल के दर्शन को ललाहित थी और जैसे ही उसने लड्डू गोपाल को देखा तो आशचर्य में पड़ गयी उसने देखा की लड्डू गोपाल खड़े हुए थे

उसने सोचा की शायद ये उसके लड्डू गोपाल नहीं है और अपनी सखी के पास जाकर ये सब पूछा-तब उस जैन धर्म की महिला ने सारा वृतान्त उसे सुनाया

उसकी बाते सुनकर हिन्दू महिला समझ गयी की ये सारा खेल उस मुरलीधर कृष्ण कन्हैया का है। और दौड़ी दौड़ी लड्डू गोपाल के पास पहुंची और उनके चरणों में गिरकर बोली – हे मेरे कन्हैया ! हे मुरलीधर ! आपकी दया की कोई पराकाष्ठा नहीं है आप की कृपा का कोई सानी नहीं है।

और फिर उस जैन वृद्ध महिला से बोली कि हे सखी तू धन्य है तुझ पर श्री कृष्णा की ऐसी कृपा हुई है जो कोई कभी सोच भी नहीं सकता है , तुझे नहीं पता की हमारे लड्डू गोपाल के पाँव तो ऐसे थी है क्यूंकि उनका ये बालस्वरूप बैठी हुई मुद्रा में है , लेकिन तेरी भक्ति ने उनके इस स्वरुप को बदल दिया उनके पैर सीधे कर दिए।

बोलो वृन्दावन बिहारी लाल की जय
राधा रानी सरकार की जय

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